काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी


काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन 1780 में करवाया गया था। बाद में महाराजा रंजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा मढ़वाया गया था। काशी विश्वनाथ भी भारत के अमीर मंदिरों में से एक है। यहां हर साल करोड़ों का चढ़ावा आता है।

शिव की नगरी काशी में देवादिदेव महादेव साक्षात वास करते हैं. यहां बाबा विश्वनाथ के दो मंदिर बेहद खास हैं.

शिव की नगरी काशी में महादेव साक्षात वास करते हैं. यहां बाबा विश्वनाथ के दो मंदिर बेहद खास हैं. पहला विश्वनाथ मंदिर जो 12 ज्योतिर्लिंगों में नौवां स्थान रखता है, वहीं दूसरा जिसे नया विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है. यह मंदिर काशी विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित है.

काशी नगरी पतित पावनी गंगा के तट पर बसी. यह भी कहा जाता है कि काशी नगरी देवादिदेव महादेव की त्रिशूल पर बसी है. धर्मग्रन्थों और पुराणों में जिसे मोक्ष की नगरी कहा गया है जो अनंतकाल से बाबा विश्वनाथ के भक्तों के जयकारों से गूंजती आयी है, शिव भक्तों की वो मंजिल है जो सदियों से यहां मोक्ष की तलाश में आते रहे हैं. काशी की इस यात्रा पर हम आपको महादेव के दो ऐसे रूपों के दर्शन कराएंगे, जिन्हें बाबा विश्वनाथ के नाम से पुकारा जाता है. आप सोच रहे होंगे कि एक ही नगरी में भोले के दो रूप वो भी एक ही नाम से कैसे? वाराणसी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में विराजमान बाबा विश्वनाथ की महिमा और उनके महत्व के बारे में भी हम आपको बताएंगे.

काशी विश्वनाथ मंदिर के अर्चक श्रीकांत मिश्र कहते हैं कि 12 ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का नौवां स्थान है. मान्यता है कि अगर कोई भक्त बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाता है तो उसे जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. बाबा का आशीर्वाद अपने भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है.

ऐसी मान्यता है कि एक भक्त को भगवान शिव ने सपने में दर्शन देकर कहा था कि गंगा स्नान के बाद उसे दो शिवलिंग मिलेंगे और जब वो उन दोनों शिवलिंगों को जोड़कर उन्हें स्थापित करेगा तो शिव और शक्ति के दिव्य शिवलिंग की स्थापना होगी और तभी से भगवान शिव यहां मां पार्वती के साथ विराजमान हैं.

एक दूसरी मान्यता के मुताबिक, मां भगवती ने खुद महादेव को यहां स्थापित किया था. बाबा विश्वनाथ के मंदिर में तड़के सुबह की मंगला आरती के साथ पूरे दिन में चार बार आरती होती है. मान्यता है कि सोमवार को चढ़ाए गए जल का पुण्य अधिक मिलता है. खासतौर पर सावन के सोमवार में यहां जलाभिषेक करने का अपना एक अलग ही महत्व है.

काशी के कण-कण में चमत्कार की कहानियां भरी पड़ी हैं, लेकिन बाबा विश्वनाथ के इस धाम में आकर भक्तों की सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं औऱ जीवन धन्य हो जाता है. एक तरफ शिव के विराट और बेहद दुर्लभ रूप के दर्शनों का सौभाग्य मिलता है, वहीं गंगा में स्नान कर सभी पाप धुल जाते हैं.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद नए काशी विश्वनाथ मंदिर कहने को नया है, लेकिन इस मंदिर का भी महत्व उतना ही है जितना पुराने काशी विश्वनाथ का. कहते हैं यहां आकर भोले भंडारी के दर्शन कर जिसने भी रूद्राभिषेक कर लिया, उसकी सभी मुरादें हो जाती हैं. उसके लिए मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं. यहां देवगण विराजते हैं और गंगा की धार बहती है, वो परमतीर्थ वाराणसी कहलाता है. यहां आने भर से ही भक्तों की पीड़ा दूर हो जाती है. तन-मन को असीम शांति मिलती है. क्योंकि यहां स्वयं भगवान शिव विराजते हैं. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में काशी के राजा कहे जाने वाले भगवान शिव के दर्शन होते हैं, जिन्हें भक्त बाबा विश्वनाथ के नाम से ही पुकारते हैं.

एक भक्त आनंद शंकर गुप्ता ने कहा, ‘कहते हैं अगर भक्तों के जीवन में ग्रह दशा के कारण परेशानी आ रही है, ग्रहों की चाल ने जीना दूभर कर दिया है तो यहां आकर दर्शन करने के बाद यदि रुद्राभिषेक करा दिया जाए तो भक्तों को ग्रह बाधा से मुक्ति मिल जाती है.

नए विश्वनाथ मंदिर की स्थापना की कहानी जुड़ी है पंडित मदन मोहल मालवीय जी से. कहते हैं एक बार मालवीय जी ने बाबा विश्वनाथ की उपासना की, तभी शाम के समय उन्हें एक विशालकाय मूर्ति के दर्शन हुए, जिसने उन्हें बाबा विश्वनाथ की स्थापना का आदेश दिया. मालवीय जी ने उस आदेश को भोले बाबा की आज्ञा समझकर मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ करवाया. लेकिन बीमारी के चलते वो इसे पूरा न करा सके. तब मालवीय जी की मंशा जानकर उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने इस मंदिर के निर्माण कार्य को पूरा करवाया.

नए विश्वनाथ मंदिर के पुजारी विश्वनाथ पांडे कहते हैं कि वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं, लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है. मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहां अपने आप को कृतार्थ करते हैं, वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं.

विद्यार्थी वरुण कुमार राय ने कहा कि पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहां भक्तिभाव से जुटते हैं. इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहां का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनियाभर के श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. विश्वविद्यालय के प्रांगण में होने के कारण खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है.

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