प्रदोष व्रत


व्रत के अधिकारी – जो पुरुष अपने वर्ण और आश्रम के आचार में लगा हो तथा शुद्ध मन वाला ही व्रत का अधिकारी है I स्त्री हो या पुरुष सभी व्रत करने के अधिकारी हैं, सधवा स्त्रियों को पति की आज्ञा के बिना व्रतादि करने का अधिकार नही है I जो स्त्री पिता, पति, और पुत्र से व्रत करने की आज्ञा के बिना हठात व्रत करती है उसे उसका फल प्राप्त नही होता है, वरन पाप की अधिकारिणी बनती है I स्त्री पति की आज्ञा से सभी व्रतों को कर सकती है I स्त्रियों को पति से पृथक होकर यज्ञ व्रत, दान आदि कार्य नही करने चाहिए, स्त्रियों को पति की सेवा से ही इष्ट लोक मिल जाता है, पति में अंत:करण को लगा समर्पित भाव से सेवा करती हुई पत्नी पति के द्वारा किये गये जप यज्ञ तप और तर्पण के आधे फल को ग्रहण कर लेती है I जो स्त्री पति की सेवा में संलग्न न हो कर उपेक्षा से व्रत आचरण आदि करती है, वह अपने पुण्य का फल पति को दे देती हे और ऐसी स्त्री को पति के द्वारा किये गये पुण्य कार्य का कोई फल प्राप्त नही होता है I पत्नीरहित यज्ञादि अनुष्ठान अपूर्ण मने गये हैं I

प्रदोष व्रत – सभी देशों तथा धर्मो में व्रत का महत्वपूर्ण स्थान हैं, व्रत से मनुष्य की अंतरात्मा शुद्ध होती है उससे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धिशक्ति , मेधाशक्ति तथा पवित्रता की वृद्धि होती है I अकेला एक उपवास सैकड़ों रोगों का संहार करता है नियमित व्रत तथा उपवासों के पालन से उत्तम एवं स्वास्थ्य दीर्घ जीवन की प्राप्ति होती है यह सर्वथा निर्विवाद है I प्रदोष व्रत भगवान शिव की प्रसन्नता और प्रभुत्व के प्रयोजन से प्रत्येक मॉस के कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों में त्रयोदशी में किया जाता है I शिव पूजन और रात्रि भोजन से इसे प्रदोष कहते हैं , शिव पूजा नक्त भोजनात्मकम प्रदोषम I इसका समय सूर्यास्त से दो घडी रात्रि बीतने तक है I जो मनुष्य प्रदोष के समय शिव जी के चरण कमल का अनन्य मन से आश्रय लेता है उसके धन धान्य स्त्री पुत्र बन्धु – बांधव और सुख – संपत्ति सदैव बढ़ते रहते है I यदि कृष्ण पक्ष में सोम और शुक्ल पक्ष में शनि प्रदोष हो तो उस प्रदोष का विशेष फल होता है I संतान के लिए शनि प्रदोष अधिक फलदायी है I इनके अतिरिक्त  आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए अर्क प्रदोष उत्तम होता है 1. कामना पूर्ति हेतु , पुत्र प्राप्ति हेतु वर्षपर्यंत या कामना पूर्ति तक शुक्ल पक्ष की जिस त्रयोदशी को शनि वार (शनि प्रदोष) हो उससे प्रराम्भ करें , 2. ऋण मोचन जिसदिन त्र्य्दाशी को मंगलवार (भौम प्रदोष) हो उससे प्रारंभ करें ,3. सौभाग्य और स्त्री की समृद्धि जिस दिन त्रयोदशी को शुक्रवार हो (भृगु प्रदोष) से आरम्भ करें 4. अभीष्ट सिद्धि   जिस दिन त्र्योदशी को सोमवार हो (सोम प्रदोष) उससे प्रारंभ करें 5. आयु आरोग्य आदि की कामना हो तो जिस त्रयोदशी को रविवार (रवि प्रदोष) हो उससे आरम्भ करें इस व्रत की पूरण अवधि 21 वर्ष है परन्तु सौर सामर्थ्य न हो तो उसका उद्यापन करके विसर्जन कर देवें , व्रत के दिन प्रातः स्नानादि कर संकल्प ले, सूर्यास्त के समय पुनः स्नान कर शिव के समीप बैठ कर वेद पाठी ब्राह्मण की आज्ञानुसार शिव का षोडशोपचार पूजन करें , नैवेद्य में सेंके हुए जों का सत्तू घी और शक्कर अथवा यथारुचि भोग लगा दें  इसके बाद वहीँ आठों दिशाओं में आठ दीपक रखे प्रत्येक के स्थापन में आठ बार नमस्कार करें , शिव् पार्वती की प्रार्थना करें, सूर्यास्त से दो या तीन घडी रात व्यतीत होने से पहले ही प्रसाद पाकर शिव का स्मरण करें ,केवल सन्यासी और विधवा को रात्रि भोज निषेध होने से उन्हें पूजन पश्चात दिन के आठवें भाग में भोजन कराना चाहिए I

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: