सांई बाबा मंदिर,


सांई बाबा एक भारतीय गुरु, योगी और फकीर थे, उन्हें उनके भक्तों द्वारा संत कहा जाता है। उनके असली नाम, जन्म, पता और माता पिता के सन्दर्भ में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। सांई शब्द उन्हें भारत के पश्चिमी भाग में स्थित प्रांत महाराष्ट्र के शिर्डी नामक कस्बे में पहुंचने के बाद मिला।शिर्डी सांई बाबा मंदिर भी यहीं बना हुआ है। सांई बाबा मंदिर भारत के अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की संपत्ति और आय दोनों ही करोड़ों में है। मंदिर के पास लगभग 32 करोड़ की चांदी के जेवर हैं। 6 लाख कीमत के चांदी के सिक्के हैं। साथ ही, हर साल लगभग 350 करोड़ का दान आता है। शिरडी के साईं की प्रसिद्धि दूर दूर तक है और यह पवित्र धार्मिक स्थल महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित है. यह साईं की धरती है जहां साईं ने अपने चमत्कारों से लोगों को विस्मृत किया. साईं का जीवन शिरडी में बीता जहां उन्होंने लोक कल्याणकारी कार्य किए. उन्होंने अपने अनुयायियों को भक्ति और धर्म की शिक्षा दी. साईं के अनुयायियों में देश के बड़े-बड़े नेता, खिलाड़ी, फिल्म कलाकार, बिजनेसमैन, शिक्षाविद समेत करोड़ों लोग शामिल हैं. शिरडी में साईं का एक विशाल मंदिर है. मान्यता है कि, चाहे गरीब हो या अमीर साईं के दर्शन करने इनके दरबार पहुंचा कोई भी शख्स खाली हाथ नहीं लौटता है. सभी की मुरादें और मन्नतें पूरी होती हैं.

शिरडी के साईं बाबा

शिरडी के साईं बाबा का वास्तविक नाम, जन्मस्थान और जन्म की तारीख किसी को पता नहीं है. हालांकि साईं का जीवनकाल 1838-1918 तक माना जाता है. कई लेखकों ने साईं पर पुस्तकें लिखीं हैं. साईं पर लगभग 40 किताबें लिखी गई हैं. शिरडी में साईं कहां से प्रकट हुए यह कोई नहीं जानता. साईं असाधारण थे और उनकी कृपा वहां के सीधे-सादे गांववालों पर सबसे पहले बरसी. आज शिरडी एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है. साईं के उपदेशों से लगता है कि इस संत का धरती पर प्रकट होना लोगों में धर्म, जाति का भेद मिटाने और शान्ति, समानता की समृद्धि के लिए हुआ था. साईं बाबा को बच्चों से बहुत स्नेह था. साईं ने सदा प्रयास किया कि लोग जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं व मुसीबतों में एक दूसरे की सहायता करें और एक दूसरे के मन में श्रद्धा और भक्ति का संचार करें. इस उद्देश्य के लिए उन्हें अपनी दिव्य शक्ति का भी प्रयोग करना पड़ा.

शिरडी का साईं मंदिर

शिरडी में साईं बाबा का पवित्र मंदिर साईं की समाधि के ऊपर बनाया गया है. साईं के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए इस मंदिर का निर्माण 1922 में किया गया था. साईं 16 साल की उम्र में शिरडी आए और चिरसमाधि में लीन होने तक यहीं रहे. साईं को लोग आध्यात्मिक गुरु और फकीर के रूप में भी जानते हैं. साईं के अनुयायियों में हिंदू के साथ ही मुस्लिम भी हैं. इसका कारण है कि अपने जीवनकाल के दौरान साईं मस्जिद में रहे थे जबकि उनकी समाधि को मंदिर का रूप दिया गया है. 

साईं मंदिर में दर्शन

साईं का मंदिर सुबह 4 बजे खुल जाता है. सुबह की आरती 5 बजे होती है. इसके बाद सुबह 5.40 से श्रद्धालु दर्शन करना शुरू कर देते हैं जो दिनभर चलता रहता है. इस दौरान दोपहर के वक्त 12 बजे और शाम को सूर्यास्त के तुरंत बाद भी आरती की जाती है. रात 10.30 बजे दिन की अंतिम आरती के बाद एक शॉल साईं की विशाल मूर्ति के चारो ओर लपेट दी जाती है और साईं को रुद्राक्ष की माला पहनाई जाती है. इसके पश्चात मूर्ति के समीप एक गिलास पानी रख दिया जाता है और फिर मच्छरदानी लगा दिया जाता है. रात 11.15 बजे मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है. साईं के समाधि पर प्रतिदिन लाखों की तादाद में लोग आते हैं और साईं की झोली में अपनी श्रद्धा और भक्ति के अनुरूप कुछ दे कर चले जाते हैं. शिरडी के साईं बाबा का मंदिर अपने रिकार्ड तोड़ चढ़ावे के लिए हमेशा खबरों में भी रहता है. साल दर साल यह रिकार्ड टूटता ही जा रहा है. कुछ दिनों पहले किए गए आकलन के अनुसार साल 2018 में भक्तों ने यहां अरबों रुपये चढ़ाए हैं. किसी ने साईं को सोने का मुकुट दिया तो किसी ने सोने का सिंहासन. किसी ने चांदी की बेशकीमती आभूषण दिए तो किसी ने करोड़ों की संपत्ति. कोई करोड़ों का गुप्तदान करके चला गया तो किसी ने अपनी पूरी जायदाद भगवान के हवाले कर दी.

साईं म्यूजियम

साईं से जुड़े विभिन्न वस्तुओं का संग्रह है साईं म्यूजियम. यह म्यूजियम साईंबाबा संस्थान की देखरेख में चलाया जाता है और यहां साईं से जुड़ी कई निजी वस्तुएं भक्तों के दर्शन हेतु रखे गए हैं. साईं का पादुका, खानदोबा के पुजारी को साईं के दिए सिक्के, समूह में लोगों को खिलाने के लिए इस्तेमाल किए गए बर्तन, साईं द्वारा इस्तेमाल की गई पीसने की चक्की उन वस्तुओं में शामिल हैं जो लोगों को दर्शन के लिए इस म्यूजिमय में रखी गई हैं.

शनि शिंगणापुर

अहमदनगर जिले में ही स्थित है प्रसिद्ध शनि शिंगणापुर मंदिर जो साईं के मंदिर से करीब 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. शनि शिंगणापुर गांव कि खासियत यहां के कई घरों में दरवाजे का ना होना है. यहां के घरों में कहीं भी कुंडी तथा कड़ी लगाकर ताला नहीं लगाया जाता है. मान्यता है कि ऐसा शनिदेव की आज्ञा से किया जाता है.

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