देव शयन में धार्मिक एवं मांगलिक कार्य क्यों नहीं

ब्रह्मा जी ने प्रक्रति की स्थापना एवं आवश्यक जीवयापन  के लिए छः ऋतुओं की स्थापना की, इसी आधार को लाकर छः माह देवशयन और छः माह देव जागरण अर्थात सूर्य को उत्तरायण और दक्षिणायन बनाया | उत्तरायण में देवताओं का जागरण होता है और इस समय में जो भी कार्य करे जाते हैं वह देवताओं को प्राप्त होते है और शुभ होते है | दक्षिणायन में राक्षसों का अधिकार होता है  अतः कार्यो में बाधा आती है अतः त्योहारों के अतिरिक्त इनमे शुभ कार्यों को करने का अभाव रहता है | इसमें किसी भी प्रकार के मांगलिक एवं धार्मिक इसीलिए नहीं होते क्योंकि इसमें देवताओं की साक्षी ही नहीं रहती  तो उन कार्यो को करने से क्या लाभ |

राजा बलि से भगवान् विष्णु ने वामन अवतार में तीन पग पृथ्वी मांगकर राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया था | राजा बलि ने उनसे आशीर्वाद में छः माह तक पाताल में अपने दरवाजे पर उनकी सुन्दर मूर्ति के दर्शन हेतु पहरेदारी करने को कहा | विष्णु की स्वर्ग से अनुपस्तिथि के कारण लक्ष्मी जी को नारद जी ने बताया तब भैयादूज के दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि के टीका कर पहरेपर खड़े विष्णु को पतिरूप में दक्षिणा में मांग लिया | देवोत्थानी एकादशी के दिन ही विष्णु पृथ्वी पर आतें हैं ज्योतिष इस दिन का  महत्त्व देकर पांच स्वयं सिद्ध महूर्तों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है इस दिन विवाह भी होते है क्योंकि विष्णु का तुलसी से इसी दिन विवाह हुआ था देवताओं का एक दिन मनुष्य के छः माह  के बराबर होने से देवशयन और उत्थान का अंतर छः माह तक का रहता है |

शास्त्रों के आधार पर हमारे तीन मुख्य देवता है ब्रह्मा,विष्णु  और महेश | एक उत्पत्ति, दूसरा पालन और तीसरा संहार का अधिकारी है इन तीनो के शयन का समय चार – चार माह का निर्धारित किया गया है | सबसे पहले ब्रह्मा जी का शयन पौष से प्रराम्भ होता है इस समय विष्णु और शिव जागकर प्रथ्वी का पालन करते है और रक्षा का दायित्व निभाते हैं | इसके बाद अषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक विष्णु शयन, जिससे सारे धार्मिक तथा मांगलिक कार्य अस्त रहते है क्योंकि भगवान् विष्णु पृथ्वी के पालनहार और भोक्ता है | उनके शयन में कोई रचना नहीं हो पाती इस समय शिव जागरण होता है तथा मंदिरों में शिव पूजा का विधान अधिक होता है | श्रावण में शिव अधिक पूजे जाते है इसके पश्चात् शिव शयन होता है  जो भाद्रपद की अमावस्या से शिवरात्रि तक चलता है  जिसमे शिव के ऊपर टपकने का बर्तन जलहरी हटा दिया जाता है शिवरात्रि के दिन पुनः जलहरी लगा दिया जाता है इस प्रकार यह क्रम चलता रहता है इसका अर्थ है की विष्णु के शयन के समय धार्मिक एवं मांगलिक कार्य नहीं होने चाहिए क्योंकि न तो विष्णु  प्रथ्वी पर होते है न उत्तरायण और न ही उत्तर गोल | जब सब चीजों का लोप हो जाता है तो फिर हमारे भविष्य निर्माण के महत्वपूर्ण पलों को हम क्यों देव शयन में करे |