लापरवाही

जिम्मेदारी का एहसास प्राप्त करने का अर्थ है कि हमने किसी तपस्या का फल प्राप्त कर लिया है, वहीँ दूसरी और गैर-जिम्मेदार लोग जहाँ इस तपस्या के फल से वंचित रह जाते है, साथ ही वह स्वयं व् समाज के लिये भी हानिकारक सिद्ध होते है क्योंकि जिम्मेदारी न होने का अर्थ लापरवाही माना जा सकता है | अपनी संतानों के प्रति जिन बिन्दुओं पर सबको अधिक दिक्कत आती है उनमे से प्रमुख “लापरवाही” ही होती है | किसी भी लापरवाह को यह पता ही नहीं चलता कि कब उसकी लापरवाही “आलस्य” में परिवर्तित हो गयी और अंततः यही आलस्य  व्यक्ति को “प्रमादी” बनाकर उसकी सफलता के समस्त दरवाजों को बंद कर देता है  | अच्छे-अच्छे तेजस्वी, समझदार और योग्य व्यक्तियों में भी कुछ न कुछ लापरवाही का अंश होता ही है | पुरातन मनीषियों ने एक शब्द “बेपरवाही” भी दिया है | इन दोनों ही शब्दों की विद्वानों ने अलग – अलग व्याख्या कर दोनों शब्दों में भेद को निरुपित किया है | लापरवाही कृत्य से जुड़ा है | बेपरवाही परिणाम से | जिस प्रकार से कर्म करना था उस प्रकार न करना अथवा उचित समय पर न करना “लापरवाही” कहलाता है | वहीँ परिणाम कुछ भी हो ईश्वर पर  आश्रित होकर कर्म में निरत रहना “बेपरवाही” कहलाती है | ईश्वर पर भरोसा और कर्म के प्रति अनुराग आपको सफलता तक ले जाता है |

बच्चों को लापरवाही से बचाने के लिए उन्हें बेपरवाही के अर्थ को बारीकी से सकारात्मक प्रकार से बताना  और समझाना चाहिए | उनके लालन-पालन के समय हम जो निर्णय उन पर लाद देते हैं उनमे से अधिकाँश का भाव यह होता है कि हम जो चाहते है बच्चे भी वेसा ही करें | प्रायः हम यह भूल जाते है कि हम जो चाहते है क्या बच्चे उसे समझ भी रहें है या नही | आपके बच्चे ने आपके मुकाबले दुनिया कम देखी है | आपकी चाहत उसकी समझ बन जाये ये आसान नहीं है | वह निर्दोष तो यह भी नही जनता की वह लापरवाही कर रहा है | उसके लिए सबकुछ सहज और स्वभाविक है | इसलिए अपनी चाहत उनपर थोपने के स्थान पर उन्हें बेपरवाही का अर्थ समझाएं | यदि वे बेपरवाही को समझ गए तो लापरवाही और उससे उत्पन्न हुए आलस्य, प्रमाद और असफलता अनावश्यक तनाव से आप अपनी संतानों को से सुरक्षित रख सकते है | तनाव रहित बालक हमेशा समाज देश के लिए उपयोगी सिद्ध होगा ,इसमें कोई संदेह नहीं है |

जीवन का कोई लक्ष्य तो होना ही चाहिए | बिना लक्ष्य के बच्चे सही दिशा में अग्रसर नहीं होते, इसलिए लक्ष्य तय करने में तो उनकी सहायता करनी ही चाहिए परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए की लक्ष्य प्राप्ति के लिए बच्चे भी सामर्थ्य का आंकलन अवश्य करले | साथ ही  वह आपका लक्ष्य नहीं होना चाहिए जो आप अपने बच्चे से पूरा करवाना चाहते हो, और परिणाम ईश्वर पर आश्रित होना चाहिए | इस प्रकार आप अपने बच्चों को तनाव से बचाइए | इससे  समाज से  कई रोगों को जो तनाव के कारण उत्पन्न होते है उनसे बचाकर हम बच्चों को श्रेष्ठ एवं सफल बना सकते है |