पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण एवं भौतिकवाद की अतिशय अनुपालना के कारण हम, हमारा समाज एवं हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति निरंतर पतन की और गतिशील है I विडम्बना यह है कि जिस पाश्चात्य संस्कृति और उसके भौतिकवाद का हम अन्धानुकरण कर रहे हैं वही पाश्चात्य संस्कृति हमारी सनातन संस्कृति को आत्मसात करने पर विवश है I

अपनी  सनातनी संस्कृति को विस्मृत कर भौतिकवाद की चमक – दमक के प्रति लालसा का प्रमुख कारण संभवतः यह है कि हम इस चमक – दमक में इतना वह गये हैं अथवा ह्रास को प्राप्त हो गये हैं कि हमें अपनी पीढ़ियों को हस्तांतरित करने को कुछ भी शेष नही रह गया , संस्कृति ह्रास और विस्मरण की यह प्रक्रिया निरंतर गतिमान है. इसी का परिणाम यह है कि आज हमारी पीढ़ी को संस्कृति ,संस्कार ,नियम सिद्धांत तथा जीवन – मूल्य बेमानी लगने लगे हैं ,और उसे सब कुछ आडम्बारों से ही मिलता दीखता हैI ,हमारी सनातनी संस्कृति और पाश्चात्य सभ्यता में मूलभूत अंतर यह है कि हम सदैव आत्मोद्धार के लिए प्रयत्नशील रहते है जबकि पाश्चात्य संस्कृति का मूल आधार ही आडम्बर और सुख भोग है I हमारी संस्कृति जीवन मूल्यों ,रीति रिवाज़ , भावना ,आध्यात्म एवं आत्मोद्धार इत्यादि के वैज्ञानिक पक्ष पर आधारित है, जोकि हमारे मनीषियों के वैज्ञानिक तथ्यों पर सतत चिंतन अध्ययन एवं अनुभवों पर आधारित है ,जबकि संसार की प्रत्येक संस्कृति किसी न किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा निर्धारित नियमो पर आधारित् है Iअस्तु

प्राय: हमारा समाज, हमारी अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता के बारे में बाते करता तो मिल सकता है पर उसके पास न तो कोई सनातनी संस्कृति का ज्ञान होता है और न ही वह अपनी पीढ़ी को अपनी सनातनी संस्कृति के ज्ञान सम्प्रेषण में सक्षम प्रतीत होता है ऐसा कदापि नही है की आज के युग में कोई सनातनी अथवा वैदिक साहित्य उपलब्ध नही है पर इन सबके अध्ययन के लिए हम सबके पास समय ही नही है हम पूर्णत: भौतिक वाद की चमक – दमक की धारा में प्रवाहित हो रहे हैं इसका कारण यह भी माना जा सकता है कि वैयक्तिक सुख का उपभोग करने की लालसा के कारण हमारे संयुक्त परिवार टूट चुकने के कगार पर आ पहुंचे हैं इस कारण भी प्राचीन पारंपरिक ज्ञान पीढ़ी को प्राप्त नही हो पाता है I अस्तु

फिर भी आज ऐसे लोगों की भी कमी नही है जो हमारी गौरवमयी सनातन संस्कृति पर गर्व करने के साथ जानकारी एकत्र करने की चेष्ठा भी करते हैं किन्तु इसके लिए आज के युग में वह पूर्णत: इन्टरनेट पर ही आधारित हैं ,और इन्टरनेट पर समस्त सामग्री प्रमाणिक एवं एक स्थान पर उपलब्ध नही हो पाती I कई वर्षों से मै इसी समस्या पर विचार कर कार्य रहा था I पर सम्पूर्ण सनातन संस्कृति साहित्य को एकत्र कर इनका सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत कर पाना मेरे जैसे तुच्छ प्राणी के लिए सम्भव नही था , फिर भी अपनी सनातन संस्कृति के  मूल बिंदुओं का  संक्षिप्त विवरण संकलित करने का प्रयास किया है भविष्य में आप  सभी के सहयोग से इसे और भी विस्तार दिया जा सकेगा I इस हेतु अपने स्नेहिल एवं श्रद्धेय पाठको से मेरा सविनय अनुनय है कि अपनी संस्कृति के प्रचार एवं संरक्षण हेतु इस संकलन को पढने, समझने एवं आत्मसात करने के लिए प्रेरणा के सम्बाहक बने I आशा करता हूँ कि यह संकलन उन विद्यार्थियों के लिए अति महत्त्वपूर्ण  सिद्ध हो सकता है जो कि अंग्रेजी माध्यम  के स्कूलों  में अध्ययन करके अपनी संस्कृति को विस्मृत कर रहे हैं I