हिन्दू जाति में प्राचीन काल से जो अनेक प्रकार की धारणाये या प्रथाएं प्रचलित हैं  उनमे नवग्रहों की उपा सना भी है यह केवल प्रथा मात्र नहीं है इसके मूल में हम लोगों के शरीर में नवग्रहों का सम्बन्ध और ज्योतिष की द्रष्टि से सुपुष्ट विचार भी है | प्रत्येक शरीर की उत्त्पत्ति के समय चाहें वो गर्भाधान का हो या भूमिष्ठ होने को हो | सूर्य और इतर ग्रहों का प्रथ्वी के साथ जैसा संबंध होता है |और ग्रहचार पद्धति के अनुसार उस प्रदेश में उस प्रकृति के शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है वह जीवन भर किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है | शरीर की उत्त्पत्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है जिसका  जैसा कर्म उसका वैसा शरीर |

जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी काम वासनाएं रहती है उस जीवन में जैसी घटनाएँ घटने वाली होती गई उसी के अनुसार उस शरीर के जन्म के समय वैसी ही गृहस्थिति रहती है | यह भी कहा जा सकता है की वैसी गृह स्थिति में ही उसका जन्म होता है | अथवा ग्रहों की एक स्थिति में रहने पर भी भिन्न भिन्न देश और शरीर के भेद से उनका भिन्न भिन्न प्रभाव पड़ता है |  इसी से ज्योतिष शास्त्र में कहा गया हैकि गृह किसी नवीन फल का विधान नही करते अपितु प्रारब्ध के अनुसार घटने वाली घटना को पहले ही सूचित कर देते हैं | इस द्रष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है की ग्रहों के द्वारा भावी घटनाओं का ज्ञान हो जाने पर साधना के द्वारा उन्हें रोका भी जा सकता है | प्राचीन ऋषियों , योगियों और सिद्ध पुरुषों के द्वारा ऐसा किया गया है परन्तु सर्व साधारण के पक्ष में यह बात  दुसाध्य है इसलिए उन्हें ग्रहमंडलादि शास्त्रों की शरण लेनी पड़ती हैं | प्राचीन काल में इस वैदिक मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन होता था , इसी कारण वे सुखी थे | आज भी जहाँ प्राचीन प्रथाओं का पालन होता है वहां प्रत्येक शांतिक और पौष्टिक कर्म में पहले नवग्रह की पूजा होती है | पूजा पद्धति के अनुसार उनका अनुष्ठान करना चाहिए |

नवग्रहों के प्रकोप से बचने के लिए यहाँ एक वैदिक नवग्रहपीड़ाहर स्तोत्र दिया जा रहा है

ग्राहाणामादित्ययो लोकरक्षणकारक: | विषमस्थानसम्भूतां पीडां हरतु मे रवि: ||1

रोहिणीश: सुधामूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन: | विषमस्थानसम्भूतां पीडां हरतु मे विधु: ||

भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत सदा | वृष्टिकृद वृष्टिहर्ता च पीडां हरतु मे कुज: ||

उत्पातरूपो जगतां चन्द्र्पुत्रो महाद्युति: | सूर्यप्रियकरो विद्वान् पीड़ा हरतु मे बुध: ||

देवमंत्री विशालाक्ष: सदा लोकहिते रत: | अनेकशिष्यसम्पूर्ण: पीडां हरतु मे गुरु: ||

दैत्यमंत्री गुरूस्तेषाम प्राणदश्च महामति: | प्रभु: तारागृहाणाम  च पीड़ा हरतु में भृगु ||

सुर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय: | मंद्चार: प्रसन्नात्मा पीड़ा हरतु में शनि ||

अनेकरूप वर्णऐश्च  शतशो‍थ सहस्रदृक |उत्पातरुपो जगतां पीड़ा हरतु मे तम: ||

महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबल: | अतनुश्चोध्वर्केशश्च पीड़ा हरत मे शिखी ||

 || इति शुभम ||