ज्योतिष के एक ग्रन्थ में मैंने पढ़ा था की जो लोग पुरानों की कथा सुनते है इष्ट देव की आराधना करते है भगवान् के नाम का जप करतें है , तीर्थों में स्नान करतें है ,किसी को पीड़ा नहीं पहुचाते है ,सबका भला करतें है , सदाचार के मर्यादा का उल्लंघन नहीं करतें है , तथा शुद्ध हृदय से अपना जीवन व्यतीत करतें है ,उन पर अनिष्ट गृहों का प्रभाव नहीं पड़ता | उनको पीड़ा न पहुंचकर वे उन्हें सुखी करतें है |

सूर्य सूर्य ग्रहों के राजा हैं | ये कश्यप गोत्र के क्षत्रिय एवं कलिंग देश के स्वामी हैं | जपा कुसुम के सामान इनका रक्तवर्ण है | दोनों हाटों में कमल लिए हुए हैं , सिन्दूर के सामान वस्त्र ,अभुसन और माला धारण किये हुए हैं | ये जगमगाते हुए हीरे के सामान , चंद्रमा और अग्नि को प्रकाशित करने वाले तेज तथ त्रिलोकी का अन्धकार दूर करने वाले प्रकाश से संपन्न हैं | सात घोड़ों के एक चक्र रत पर आरूढ़ होकर सुमेरू की प्रदक्षिणा करते हुए , प्रकाश के समुद्र भगवान् सूर्य का ध्यान करना चाहिए |इनके अधि देवता शिव हैं | और प्रत्याधि देवता अग्नि हैं | इस प्रकार ध्यान करके मानस पूजा और वाह्य पूजा के अनंतर मन्त्र जप करना चाहिए |

सूर्य के अनेक मन्त्रों में से एक मन्त्र है ॐ ह्रीं ह्रों सूर्याय नम: |

चन्द्रमा भगवान् चंद्रमा अत्रिगोत्रीय हैं | यामुन देश के स्वामी हैं | इनका शरीर अमृतमय है ,दो हाथ हैं एक में वर मुद्रा है दुसरे में गदा है | दूध के सामान श्वेत शरीर पर श्वेत वस्त्र , माला और अनुलेपन धारण किये हुए हैं | मोती का हार है | अपनी सुधामयी किरणों से तीनो लोकों को सींच रहे हैं |दस घोड़ों के त्रिचक्र रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर रहे हैं | इनके अधि देवता हैं उमा देवी और प्र्त्याधि देवता जल हैं |

इनका मन्त्र है ॐ ऐं क्लींसोमाय नम: |

मंगल मंगल भरद्वाज गोत्र के क्षत्रिय हैं | ये अवन्तिके स्वामी हैं | इनका आकार अग्नि के सामान रक्तवर्ण है | इनका वाहन मेष है | रक्त वस्त्र और माला धारण किये हुए हैं | हाथों में शक्ति , वर , अभय और गदा धारण किये हुए हैं | इनके अंग अंग से कांटी की धारा झलक रही है | मेष के रथ पर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए अपने अधिदेवता स्कन्द और प्रत्याधि देवता पृथ्वी के साथ सूर्य के अभिमुख जा रहे हैं |

मंगल का मन्त्र है ॐ हूँ श्रीं मंगलाय नम: |

बुद्ध बुद्ध अत्रि गोत्र एवं मगध देश के स्वामी हैं | इनका वर्ण पीला है | चार हाथों में ढाल, गदा , वर और खडग है |पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं बड़ी ही सौम्य मूर्ती है ,सिंह पर सवार हैं | इनके अधि देवता हैं नारायण और प्रत्याधि देवता हैं विष्णु |

इनका मन्त्र है ॐ ऐं श्रीं श्रीं बुद्धाय नम: |

वृहस्पति वृहस्पति अंगिरा गोत्र के ब्राह्मण हैं | सिन्धु देश के अधिपति हैं | इनका वर्ण पीत है | पीताम्बर धारण किये हुए हैं , कमल पर बैठे हैं | चार हाथों में रुद्राक्ष , वर मुद्रा, शिला और दंड धारण किये हुए हैं | इनके अधिदेवता ब्रह्मा और प्र्त्याधिदेवता इंद्र हैं |

इनका मन्त्र है ॐ ह्रीं क्लीं हूँ वृहस्पतये  नम: |

शुक्र शुक्र भृगु गोत्र के ब्राहमण है | भोजकट देश के अधिपति  है | श्वेत वर्ण है | चार हाथो में रुद्राक्ष ,वरमुद्रा ,शिला और दंड है |  श्वेत वस्त्र धारण किये हुए है | कमल पर बैठे हुए है | इनके अधिदेवता इंद्र और प्रत्याधिदेवता चन्द्रमा है |

इनका मंत्र है – ॐ ह्रीं श्रीं शुक्राय नमः |

शनि ये कश्यप गोत्र के शूद्र है | सौराष्ट्र के अधिपति है | इनका वर्ण कृष्ण है , ये कृष्ण वस्त्र धारण किया हुए है | चार हाथों में बाण,वर ,शूल , और धनुष हैं | इनका वहां गृध्र है | इनके अधिदेवता यमराज और प्रत्याधिदेवता प्रजापति है |

इनका मंत्र है  ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चराय नमः |

राहु राहु पैठीनस गोत्र के शुद्र है | मलय देश के अधिपति  है | इनका वर्ण कृष्ण है और वस्त्र भी कृष्ण है | इनका वहां सिंह है | चार हाथों में खडग , वर ,शूल और ढाल  लिए है | इनके अधिदेवता काल है और प्रत्याधिदेवता सर्प है |

इनका मंत्र  है ॐ ऐं ह्रीं राहवे नमः |

केतु ये जैमिनी गोत्र के शूद्र है | कुशद्वीप के अधिपति है | इनका वर्ण धुंए सा है, और वैसा ही वस्त्र भी धारण किये हुए है | मुख विकृत है , गीध वाहन है | दो हाथों में वरमुद्रा तथा गदा है | इनके  अधिदेवता है चित्रगुप्त है तथा है प्रत्याधिदेवता ब्रह्मा |

इनका मंत्र है – ॐ ऐं ह्रीं केतवे नमः |

ये सभी गृह अपनी अपनी गति से  सूर्य की ओर बढ़  रहे है | सबका मुख सूर्य की ओर है | पृथ्वी के साथ सबका सम्बन्ध  है | प्रत्येक शांति और पुष्टि कर्म में इनके आराधना होती है | पृथक – पृथक अरिष्ट के अनुसार भी इनकी पूजा की जाती है | इनमे से किसी एक को प्रसन्न करके  उनसे  वांछित फल भी प्राप्त किया जा सकता है |

जिस गृह का जो वर्ण है ,उसी रंग की वस्तुएं प्रायः पूजा में लगायी  जाती है | मंत्र का जितना जप होता है , उसका दशांश हवन होता है | हवन में भिन्न भिन्न प्रकार की समिधाएँ है कम में लायी जाती है | सूर्य के लिए मदार ( आक ),चन्द्रमा के  लिए पलाश  ,मंगल के लिए खैर ,बुध के लिए चिचिड़ा (अपामार्ग),बृहस्पति के लिए पीपल  ,शुक्र के लिए गुलर  , शनैश्चर के लिए शमी  और रहू केतु के लिए दूर्वा एवं कुश का प्रयोग होता है | इस प्रकार पूजा करने से ये गृह संतुष्ट हो जाते है , और किसी प्रकार का अनिष्ट न करके  सब प्रकार के इष्ट साधन  करते है |

नवगृह की दोष शांति के लिए  रत्न धरण किये जाते है  – सूर्य के लिए माणिक्य , चन्द्रमा के लिए मोती ,मंगल के लिए प्रवाल ,बुध के लिए मरकतमणि ,बृहस्पति के लिए  पुष्पराग , शुक्र के लिए हीरा ,शनि के लिए नीलकान्त मणि ,राहू के लिए गोमेद और केतु के लिए वैदूर्य मणि | इनके धारण करने से गृहों की दोष शांति हो जाती है |