‘अंगविद्या’ ज्योतिषशास्त्र के  संहितास्कंध की एक महत्वपूर्ण शाखा है | सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने समस्त प्राणियों को भिन्न – भिन्न वर्णों तथा आकृतियों में बनाया है और उनके अंग-प्रत्यंगों को विविध आकर -प्रकार प्रदान किये है | ये विविधताएं एवं विभिन्नताएं केवल शोभा के लिए नहीं है अपितु इनका गहरा सम्बन्ध व्यक्तियों के व्यक्तित्व , कृतित्व एवं स्वभाव से भी है | व्यक्तियों की आकृतियाँ एवं उनके अंग – प्रत्यंगों के विविध आकार-प्रकार सम्बंधित व्यक्ति के भावी शुभाशुभ को भी लक्षित करते है | प्राचीन काल में समुद्र नामक ऋषि ने मानव अंगों के शुभाशुभ्त्व की गहन  विवेचना की तथा अंगविद्या  का प्रणयन किया | यह अंगविद्या लोक में “सामुद्रिकशास्त्र” के नाम से जानी गयी | इसमें मनुष्य के अंगों को देखकर उसके भविष्य एवं स्वभाव जानने की विधि वर्णित है |

रामायण , महाभारत तथा गणेश – शिवस्कंद आदि पुराणों में भी अंगविद्या से सम्बंधित अनेक नियम  बतलाये गए है | यहाँ अंगविद्या  से संबंद कुछ शारीरिक लक्षणों का वर्णन  दिया जा रहा है |

प्रशस्त मानव के अंगों के लक्षण

अंगविद्या  के अनुसार प्रशस्त मानव के अंगों के लक्षण इस प्रकार कहे गए है-

जिस मनुष्य के शरीर में चौदह अंग ( पैर ,गुल्फ़, सफिक , पार्शवभाग , अंडकोष ,नेत्र ,स्तन ,कंठ के पार्श्वभाग ,ओंठ, जानुओं की संधियाँ,जांघ,हाथ,बांहे और कांख ) जो दो दो की संख्या में होते है वे बराबर हो | चार अंग ( अंगुलियाँ ,ह्रदय और दांत ) सम हों | दस अंग ( जिह्वा ,ओंठ ,तालू , आस्य ,(मुख/जबड़ा ) , नेत्र, स्तन , नख हाथ और पैर ) कमल ए सामान सुकोमल हों | दस अंग ( हाथ, पैर वक्षःस्थल ,ग्रीवा ,अंडकोष , ह्रदय ,सिर ,मस्तक , उदर और पीठ ) सुविस्तृत हों | चार अंग ( नेत्रों की पुतलियाँ , भौहें ,दाढ़ी और सिर के बाल ) काले हों | तथा तीन अंग ( पुतलियों के अतिरिक्त नेत्रों के शेष भाग और दन्त ) उज्जवल हों | तो वह मनुष्य श्रेष्ठ लक्षणों वाला कहा जाता है |

सामुद्रिकशास्त्र में महापुरुषों के लक्षणों को बताते हुए कहा गया है की जिस पुरुष के सात  अंग ( नख ,चरण , हथेली ,जीभ , ओंठ ,तालू तथा  नेत्रांत ) लाल हों , छः अंग ( कक्षा (कांख),वक्ष , कृकारिका  (गर्दन का पिछ्ल भाग ), नाक ,नख तथा मुंह ) ऊँचे हो  , पांच अंग  ( दांत , त्वचा , केश ,अँगुलियों के पर्व , नख ) सूक्ष्म ( पतलें ) हों ,पांच अंग ( नेत्र ,स्तन ,जीभ ,ठोढ़ी  तथा भुजाएं ) दीर्घ – लम्बें हों  ,तीन अंग (भाल , छाती तथा मस्तक ) चौड़े या विशाल हों  ,तीन अंग  – ग्रीवा ,जंघा (पिण्डली) ,महान (लिंग) छोटे हों तथा तीन अंग स्वर , नाभि तथा सत्त्व – ( मन ) गंभीर हों – इस प्रकार 32  शुभ लक्षणों वाला पुरुष  महापुरुष होता है |

इसके अतिरिक्त  अंगविद्या में शुभाशुभत्व की दृष्टि से  स्त्री एवं पुरुष –  अंगों के कुछ  विशेष लक्षण भी  बताये गए है  जिनमे  स्त्रीओं के पादतल से लेकर  सिरके केशों तक का  विवेचन किया गया है तथा पुरुषों  के अंगों के शुभाशुभात्व   भी कहे  गए है |इसका विस्तृत वर्णन अगले लेख में किया जायेगा |