सात मोक्षदायिनी नगरियों में प्रथम नगरी अयोद्ध्या सतयुग में महाराज मनु ने वसायी थी | सरयू नदी के किनारे बसी यह नगरी बारह योजन (144 किलोमीटर ) लम्बी तथा तीन योजन (36 किलोमीटर ) चौड़ी थी | चक्रवर्ती सम्राट दशरथ जी ने इसे विशेष रूप से वसाया था | इसमें सभी प्रकार के बाज़ार थे ,तथा इसकी रक्षा खाईयों किबाड़ों शत्घ्नियों से होती थी | महाराज इक्ष्वाकु , अनरणय , मान्धाता , प्रसेनजित , भरत, सगर, अंशुमन , दिलीप , भागीरथ ,ककुत्स्थ, रघु , अम्बरीश जैसे सम्राटों की यह राजधानी रही है | श्री रामजी की आज्ञा से इसके प्रधान देवता हनुमान जी हैं | श्री राम के परमधाम पधारने पर यह नगरी जन शून्य हो गयी थी , तब महाराज कुश ने इसे पुनः बसाया था |  जब यह पावन नगरी पुनः लुप्त हो गयी थी तब लगभग 2500 वर्ष पूरब उज्जैनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी खोज कर इसे पुनःवसाया था 1528 में बाबर के सेना पति मीरबाकी ने यहाँ की श्री रामजन्म भूमि मंदिर को ध्वस्त्ब  किया तभी से हिन्दू जनता राजा तथा संत समाज इसकी मुक्ति के लिए संघर्षरत रहे हैं | श्री रामजन्म भूमि की रक्षा के लिए संघर्ष का लम्बा इतिहास इस प्रकार से है  –

बाबर के पुत्र हुमायूँ के शासन काल में हसबर के स्वर्गीय राजा रणविजय सिह की महारानी जयराज कुमारी ने 30000 स्त्री सैनिकों के साथ मंदिर पर पुनः अधिकार कर लिया | उनके गुरुस्वामी रामेश्वरानंद ने हिन्दू जनजागरण किया , किन्तु तीसरे दिन हुमायूँ की सेना के आक्रमण से पुनः मुसलमानों ने का कब्ज़ा हो गया | अकबर के समय में हिन्दुओं ने बीस बार आक्रमण किया किन्तु १९ बार असफल रहे 20 वीं बार रानी और उनके गुरू बलिदान हो गये | किन्तु हिन्दुओं ने चबूतरे पर कब्ज़ा कर राम मंदिर बना दिया | जहाँगीर एवं शाहजहाँ के समय में शांति रही | औरंगजेब ने जांबाज़ के नेतृत्व में सेना भेजी पर स्वामी वैष्णवदास के दस हज़ार चिमटाधारी साधुओं ने मुग़ल सेना को भगा दिया | तब औरंगजेब ने प्राधान सेनापति सय्यद हसन अली खान के साथ 50000 हज़ार सैनिक भेजे किन्तु  वैष्णवदास के चिमटाधारी शिष्य तथ गुरु गोविन्द सिंह के सिख वीरों ने सेनापति सहित मुग़ल सेना का संहार कर डाला , चार वर्ष तक औरंगजेब ने हिम्मत नही की किन्तु इसके बाद अचानक हमला कर मुगल सेना ने पुनः कब्ज़ा कर लिया | अवध के नबाब सआदत अली के समय अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह ने नबाब के साथ घोर  संग्राम कर पुनः हिन्दुओं का कब्ज़ा करवा दिया | इस प्रकार जन्मभूमि पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों का बार बार कब्ज़ा होता रहा |



1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मीर अली तथा रामशरण दास ने मिलकर शान्ति पूर्वक जन्म भूमि हिन्दुओं को सौंपने का प्रयत्न किया किन्तु अंग्रेंजों की “फूटडालो नीति” ने इसे सफल नही होने दिया | अंग्रेजी शासन काल में 1912 -13 हिन्दुओं ने दो बार आक्रमण किया किन्तु सफल नहीं रहे |

1 फरबरी 1986 न्यायलय के आदेश से श्री रामजन्म भूमि का ताला खुला तथा हिन्दुओं को पूजन और दर्शन की अनुमति मिली वहां राम चबूतरा बना और भजन कीर्तन भी होने लगे परन्तु मुस्लिम पक्ष को वहां हिन्दू भावनाओं के  अनुरूप राष्ट्र देवता श्री राम का भव्य मंदिर बनाने देना स्वीकार नही था , इसके लिए अन्दोलन हुआ जिसमे अनेक हिन्दू भक्तों ने अपनी आहुति दी अन्ततोगत्वा 6 दिसंबर 1992 को आन्दोलनरत हिन्दू जनता ने बाबरी ढांचा ध्वस्त कर दिया तब विवाद उच्च न्यायलय में गया | उच्च न्यायलय ने राम लला , निर्मोही अखाडा तथा मुस्लिम पक्ष तीनो को बराबर  बराबर भूमिं दे दी परन्तु मुस्लिम पक्ष को यह फैसला रास नही आया और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की सुप्रीम कोर्ट ने 9 नबम्बर 2019 को फैसला सुनाया जिसके अनुसार सम्पूर्ण भूमि रामलला विराजमान को दे दी गयी | इस प्रकार मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ |