वास्तव में किसी धर्म  का कट्टरता से कोई सम्बन्ध नहीं है | कट्टरता एक प्रकार की मानसिकता है जो समाज को मध्ययुगीन  कबीलियाई  संस्कृति  बीमारी के रूप में  मिली  थी |  इस मानसिकता  का उद्देश्य  समाज पर अपने परचम लहराना मात्र है  | 

इसी  उद्देश्य  की पूर्ति के लिए  इस मानसिकता के तथाकथिक बौद्धिक वर्ग ने साहित्य की रचना की | किन्तु यह साहित्य की रचना एक लम्बे शोध के बाद की गयी | इस शोध का मूल उद्देश्य  संस्कृतियों के उन बिंदुओं को लक्ष्य बनाकर की जहाँ दूसरी संस्कृतियों पर यह कबीलियाई मध्ययुगीन मानसिकता थोपी जा सके | चूँकि इस नकरात्मक  मानसिकता के निर्माताओं को यह भली प्रकार से ज्ञात था  कि  इस मानसिकता को अमल में लाना इतना आसान नहीं है इसलिए शताब्दियों तक चल सकने वाली  योजना  के अनुसार एक धर्म का अवलम्बन  लेकर विभिन्न लालचों को परोस कर  अपना अनुयायी बनाकर उन्हें  प्रेरित और  प्रलोभित किया जाता रहा है |  इस प्रकार इस मानसिकता  के रोपण के लिए अथवा गतिशील बनाये रखने के लिए तथा उद्देश्य पूर्ति  की प्राप्ति के लिए  निरंतरता  बनाये रखने के लिए जिस धर्म को अवलम्बन माना  गया  वही धर्म कट्टरवादी धर्म कहलाने लगा | सामान्यतः इस मानसिकता की यही परम्परा हे कि यदि किसी परिस्थिति में असफल भी हो जाओ तो पीड़ित और मजलूम बन कर गंगा जमुनी तहजीब की बात करो |शेष लोग आपको बचाये ,कुछ लोग संबिधान की बात करें और जो भी हो सके संरक्षण प्रदान कर अपने को सुरक्षित कर भविष्य के लिए लगे रहो | जिस जगह रहो उस उस जगह को प्रयोग कर अपनी मानसिकता की जड़ो को मजबूत करके आधिपत्य के लिए प्रयत्नशील  शील रहो |

यह मानसिकता  यूँ  ही नहीं निर्मित हुई इसका  निर्माण पूर्ण शोध व अध्ययन के बाद किया गया | साथ ही समय समय पर इस मानसिकता के क्रियान्वयन के लिए समय व् परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन भी किये गए | इन्हीं परिवर्तनों को “जिहाद” कहा जाता हैं | अथवा इस मानसिकता को अन्यों पर थोपने को जिहाद कहा जाता है |इसके लिए चाहें कोई अनैतिक कार्य ही क्यों न करना पड़े ,इन अनैतिक कार्यो , कुकृत्यों की आड़ को धर्म का नाम दिया गया | लव् जिहाद ,जमीन जिहाद,  संपत्ति जिहाद, नौकरी जिहाद, कब्ज़ा जिहाद, और न जाने कितने प्रकार के जिहाद  इत्यादि | इन सब कार्यो के लिए इन को विभिन्न पारलौकिक काम वासना की पूर्ति  प्रलोभन देकर प्रेरित करने का कार्य इस मध्ययुगीन मानसिकता के तथा कथित बौद्धिक वर्ग अपने अनुयायियों के लिए करता है | धार्मिक स्थानों का प्रबंध , सुरक्षा , संरक्षा  , समर्थन  , धन इत्यादि का प्रबन्धन इसी योजना का हिस्सा है | इसी सुसंगठित  योजना के क्रियान्वयन के कारण आज विश्व के पांच दर्जन से ज्यादा देश इसकी चपेट में हैं | इस मानसिकता का सीधा से नियम जो दिखाई पड़ते  है कि किसी स्थान पर पेर जमाने के लिए सहायता मागो ,उस सहायता से खुद को स्थापित करो , सहानुभूति अर्जित कर आर्थिक स्थिति मजबूत करो और संख्या बढ़ाओ ,जब बढ़ जाओ तो अपने लिए अधिकार मागो  मिलने लगे तो सबको अधिकार में कर के उस पर अपनी कबीलियाई मानशिकता थोप दो |

प्रश्न ये है कि जब ये कुचक्र कई सदियों से चल रहा है तो अचानक अब ये हो हल्ला क्यों होने लगा ?

उत्तर ये है कि समस्त विश्व एवं समाज का हर वर्ग आप इस मानसिकता के लोगो को पहचानने लगा है ,अब तक अपने स्वार्थ व इनके प्रति सहानुभूति के कारण इनके षड्यंत्र को समाज नहीं समझ पाया था किन्तु अब सब कुछ साफ हे साथ ही अब ये लोग भी ये समझ गए कि इस मानसिकता के अनुयायियों के षड्यंत्र को सब समझ रहे हैं |

सुरक्षित रहे | जागरूक रहे |