नामस्मरण और मंत्र जाप दोनों  भिन्न भिन्न साधन है ,एक नहीं | बहुतों को तो यह भी मालुम नहीं है कि नामस्मरण क्या होता है ?नाम का केवल उच्चारण करने से ,नाम की पवित्रता के कारण फल तो अवश्य होता है परन्तु  बहुत ऊंचा नहीं | पर नाम का यथार्थ स्मरण होने के लिए मानसिक क्रिया आवश्यक है | जिस किसी देवता का नाम हो  नाम के लेते ही उस देवता का रूप मानस चक्षु के सामने खड़ा हो जाना चाहिए  ,उनके गुण कर्मों का स्मरण होना चहिये ,भक्तो के लिए उन्होंने क्या क्या किया ये मालूम होना चाहिए और भगवान् का  सर्वोत्तम और अपना अत्यंत क्षुद्रत्व ध्यान में आना चाहिए और उनके अपार दया प्रेम से गदगद होकर उनके स्वरुप में  मिलने का प्रयत्न होना चाहिए  ऐसा नामस्मरण श्रेष्ठ है |

 नामापराध क्या है ? –

१- निंदा ,२- असुरी प्रवृत्ति वाले को नामस्मरण की महिमा बताना ३- हरि- हर में भेद दृष्टि रखना ४ – वेदों में विश्वास न करना ५ – शास्त्रों पर अविश्वास 6 – गुरु पर  अविश्वास ७- नाम महिमा को असत जानना ८-  नाम के भरोसे से निसिद्ध कर्म करना ९ – नाम के भरोसे विहित कर्म न करना और १० भगवन्न नाम के साथ अन्य साधनों की तुलना करना | इन दस का परहेज रखा जाये तो  नाम जप से शीघ्र परम सिद्धि प्राप्त होती है ,इसमें कोई संदेह नहीं है |



मन्त्र जाप

नामस्मरण के आलावा मंत्र जप कुछ और है | जप मंत्र का ही होना युक्त है | केवल भगवान् के नाम अथवा “रघु पति राघव राजा राम” इत्यादि धुनों का स्मरण या  कीर्तन हो सकता  है पर उसे जप यज्ञ कहना ठीक नहीं है | मन्त्रों की रचना विशिष्ट पद्दति से मंत्रशक्ति के विशेषज्ञ अनुभवी महात्माओं द्वारा होती है | उनका अर्थ गहन होता है  और ये मंत्र परम्परा जप के  कारण से सिद्ध और अमोघ फलदायक होते है | ऐसे मन्त्रों को सांप्रदायिक रीति से  ग्रहण करके विशेष पद्दति से उनका जप करना होता है | पुस्तकों में मंत्र को पढ़ लेने मात्र से  विशेष लाभ नहीं होता है |

कुछ लोग पुस्तकों में कोई मंत्र पढ़कर  कुछ दिन उसका जप करते है | कुछ लाभ होता न देख उसे छोड़ देते है ,तब कोई दूसरा मंत्र जपते है ,और इसी तरह नए नए मंत्र जपते है और निराश होते है | कुछ लोग कई मंत्र एक साथ ही जपते है पर किसी एक से भी उन्हें कोई लाभ नहीं होता | कुछ लोग माला जपने को ही मंत्र जप समझते  है और कोई बड़ी सी माला लेकर यंत्रवत घुमाया करते है और स्मरण रखते  है कि हमने इनती संख्या जप किया  पर इतने जप का फल अगर पूछिए तो नहीं के बराबर होता है | परमार्थ का साधन इस प्रकार नहीं हुआ करता है | मंत्र जप में माला का महत्व  अधिक नहीं है |

जप की विधि अगले अंक में