जप के अनेक प्रकार हैं उन सबको  समझ लें तो एक जप योग में ही सब साधन आ जाते हैं | परमार्थ साधन के कर्मयोग ,भक्तियोग , ज्ञान  और राजयोग ये चारो बड़े विभाग हैं | जप योग में इन चारों का अंतर्भाव हो जाता है |

जप के कुछ मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं – 1. नित्य जप 2. नैमित्तिक जप 3.काम्य जप 4. निषिद्ध जप 5. प्रायश्चित्त जप 6 .अचल जप 7.चल जप 8.वाचिक जप 9. उपांशु जप 10. भ्रमर जप 11.मानस जप 12.अखंड जप 13.अजपा जप 14. प्रदक्षिणा जप |

नित्य जप – प्रात: सायं गुरु मन्त्र का जो नित्य नियमित जप किया जाता है उसे नित्य जप कहते हैं | आपातकाल में ,यात्रा में ,अथवा बीमारी की अवस्था में जब स्नान भी नही की जा सकती तब भी हाथ पैर और मुह धोकर कम से कम कुछ तो जप अवश्य कर ही लेना चाहिए | इससे नित्य दोष दूर होते हैं जप का अभ्यास होता है | आनंद बढता ही जाता है ,जिससे इश्वर की समीपता बदती जाती है | जप संख्या बढ़ने के साथ ईश्वरीय कृपा की अनुभूति होने लगती है |

नैमित्तिक जप – जब किसी निमित्त से कोई जप किया जाता है तो उसे नैमित्तिक जप कहते हैं |सप्ताह में अपने ईष्ट का कोई न कोई वार होता ही है , उस दिन तथा एकादशी ,पूर्णिमा ,अमावस्या आदि पर्व दिनों में और महाएकादशी ,महाशिवरात्रि ,श्री राम नवमी श्री  कृष्णा जन्माष्टमी ,श्री नव दुर्गा , श्री गणेश चतुर्थी ,श्री रथ सप्तमी आदि शुभ दिनों में तथा ग्रहण आदि पर्वों पर एकांत स्थान में बैठ कर अधिक अतिरिक्त जप करना चाहिए | इससे पुन्य संग्रह बढ़ता है ,पाप का नाश और सत्वगुण की वृद्धि होती है |पितृपक्ष में भी इस प्रकार का जप अवश्य करना चाहिए |

काम्य जप – किसी कामना की सिद्धि के लिए जो जप किया जाता है उसे कामी जप कहा जाता है | यह कामी कर्म जैसा है इसे मोक्ष के चाहने वाले नही करते | आर्त,अर्थार्थी कामकामी लोगों के लिए उपयोगी है | इसके साधन में पवित्रता , नियमों का पूर्ण पालन ,जागरूकता ,धैर्य ,मनोनिग्रह , इन्द्रियनिग्रह ,वाक्संयम , मिताहार ,मितशयन तथा ब्रह्मचर्यइन सबका पालन अवश्य करने से सिद्धि शीघ्र प्राप्त होती है | इसमें कोई गड़बड़  हो तो मन्त्र सिद्ध नहीं हो सकता है |काम्य जप करने के अनेक मन्त्र हैं जप से पुण्य संग्रह तो होता है पर भोग से क्षय भी होता है इसलिए प्राश पुरुष इसे अच्छा नही समझते हैं |

निषिद्ध जप – मनमाने ढंग से अविधिपूर्वक अनियम जप जपने को निषिद्ध जप कहते हैं | निषिद्ध कर्म की तरह ही ये अच्छा नही माना जाता है | मन्त्र का शुद्ध न होना ,अपवित्र व्यक्ति से मन्त्र लेना ,अनेक मन्त्रों को अविधि पूर्वक एक साथ जपना , मन्त्र का अर्थ और विधि न जानना ,श्रद्धा का न होना ,देवाराधना के बिना ही मन्त्र जप करना ये सब निषिद्ध जप के लक्षण हैं | ऐसा जप कोई न करे इससे लाभ के स्थान पर हानि ज्यादा होती हैं |

प्रायश्चित्त जप – अपने द्वारा अज्ञानता से कोई पाप हो जाए तो उस दोष की दुरति के लिए किया जाने वाल जप प्रायश्चित्त जप कहलाता है | यह जप प्रायश्चित्त कर्म से समान आवश्यक है | मनुष्य से नित्य ही अज्ञानता के कारण अनेकों दोष होते रहते हैं | इसलिए नित्य ही उन दोषों के निवारण के लिए नित्य का नियम कर इस प्रकार प्रायश्चित्त जप करने ही चाहिये |अल्प दोष के लिए अल्प और अधिक दोष के लिए अधिक जप का विधान है | इसे नित्य नियम से चलाना चाहिए यदि कठिनाई हो तो साप्ताहिक का नियम बनाना चाहिए |

अचल जप – यह जप करने के लिए आसन, गोमुखी आदि साहित्य तथा व्यवहारिक और मानसिक स्वच्छ होना चाहिए | इस जप से अन्दर की गुप्त शक्तियां विकसित होती हे उनका उपयोग अपने स्वार्थ के लिए कदापि नही करना चाहिए | इस जप के लिए व्य्घ्राम्बर , मृगाजिन , माला और गोमुखी होना चाहिए | इस जप से इच्छाशक्ति के साथ साथ पुण्य संग्रह भी बढ़ता है | मन्त्र की संख्या  देश काल एवं स्थान निश्चित होना चाहिए | जप करते समय आसन से उठना, बात करना ,वर्जित होता है | चित्त और शरीर की स्थिरता के साथ मौन का पालन आवश्यक है | इस जप से अपार शक्ति संचित होती है |

चल जप – यह जप नाम स्मरण जैसा है | प्रसिद्द वामन , पंडित , के कथनानुसार आते जाते , उठते बैठते ,देते लेते , सोते जागते , खाते पीते ,रतिसुख भोगते सदा सर्वदा लोकलाज छोड़ कर भगवत चिंतन करने की जो विधि है वही इस जप की है अंतर यही है कि भग्न्नाम  के स्थान पर अपने मन्त्र का जप करना होता है |यह जप कोई भी कर सकता है इसमें कोई भी बंधन नही है | इस जप को करने वाला कभी मिथ्या भाषण न करे निंदा अथवा कठोर भाषण ,जली कटी सुनाना अधिक बोलने आदि से बचना चाहिए | संकट ,कष्ट, दुःख ,आघात, उत्पात, अपघात का मन पर कोई प्रभाव नही पड़ता है | इस प्रकार जप करने वाला सदैव सुरक्षित रहता है |

वाचिक जप

जिस जप का इतने जोर से  उच्चारण  होता है कि दुसरे भी सुन सके उसे वाचिक जप कहते है | बहुतों  के विचार में  यह जप निम्न कोटि  का है और इससे कुछ लाभ नहीं है | परन्तु विचार और अनुभव  से यह कहा जा सकता है  कि यह जप भी अच्छा है | विधि यज्ञ  की अपेक्षा वाचिक जप दस गुना श्रेष्ठ है  यह स्वयं मनु महाराज ने ही कहा है | इस विषय को विद्वान्  और अनुभवी जप योगियों से जानकार भावनापूर्वक जप करने से  वर्ण बीज शक्तियां जाग  उठती है | इस जप से वाक्सिद्धि तो होती ही है | उसके शब्दों  का बड़ा महत्व होता है |

उपांशु जप

वाचिक जप के बाद का यह जप है | इस जप में होंठ हिलते है और मुंह में ही उच्चारण होता है ,स्वयं ही  सुन सकते है , बाहर और किसी को सुनाई नहीं देता | विधि यज्ञ की अपेक्षा  मनु महाराज कहते है कि  यह जप सौ गुना श्रेष्ठ  है | इससे मन को  मूर्च्छना  होने लगती है  ,एकाग्रता  आरम्भ होती है  ,वृत्तियाँ  अंतर्मुख होने लगती है  और वाचिक जप के  जो जो लाभ होते है  वे सब इसमें होते है | इससे अपने अंग प्रत्यंग में  उष्णता बढती हुई प्रतीत होती है | यही जप ताप का तेज है | इस जप में  दृष्टि अर्धोन्मीलित  रहती है | एक नशा सा आता है  और मनोवृत्तियां कुंठित सी होती है  यही  मूर्च्छना  है | इसके द्वारा साधक  क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करता है |

भ्रमर जप

भ्रमर के गुंजारव की तरह गुनगुनाते हुए जो जप होता है  वह भ्रमर जप कहलाता है | किसी को यह जप करते देखने सुनने इसका अभ्यास  जल्दी हो जाता है | इसमें होंठ नहीं हिलते जीभ हिलाने का भी कोई विशेष कारण नहीं | आँखें झपी रखनी पड़ती है |भ्रूमध्य की ओर यह गुंजारव होता हुआ अनुभूत होता है | यह जप बड़े ही महत्त्व का है | इसमें प्राण सूक्ष्म  होता जाता है और स्वाभाविक कुम्भक होने लगता है | प्राण गति धीर धीरे धीमी होती है  ,पूरक जल्दी होता है  और रेचक धीरे धीरे होने लगता है | पूरक करने पर गुंजारव आरम्भ होता है | और अभ्यास से  एक ही पूरक में अनेक बार मंत्रावृत्ति हो जाती है | इसमें   मंत्रोच्चार  नहीं करना पड़ता | वंशी के बजने के समान  प्राणवायु की सहायता से ध्यानपूर्वक  मंत्रावृत्ति करनी होती है | इस जप को  करते हुए प्राण वायु से  ह्रस्व दीर्घ कम्पन हुआ करते है और आधार चक्र से लेकर  आज्ञाचक्र तक उनका कार्य  अल्पाधिक रूप से क्रमशः  होने लगता है | ये सब चक्र इससे जाग उठते है |

मानस जप

यह तो जप का प्राण ही है | इससे साधक का मन  आनन्दमय हो  जाता है | इसमें मंत्र  का उच्चारण नहीं  करना होता है | मन से ही मंत्रवृत्ति  करनी होती है  | नेत्र  बंद रहते है | मंत्रार्थ का चिंतन  ही इसमें मुख्य है | श्री मनु महाराज ने कहा है कि विधि यज्ञ  की अपेक्षा यह जप  हज़ार गुना श्रेष्ठ है | भिन्न भिन्न मन्त्रों के भिन्न भिन्न अक्षरार्थ और कुटार्थ होते है उन्हें जानने से इष्ट देव के स्वरुप का बोध होता है | पहले इष्ट देव का सगुण ध्यान करके यह जप किया जाता है ,पीछे  निर्गुण स्वरुप का ज्ञान होता है और तब उसका ध्यान करके  जप किया जाता है |

अखंड जप

यह जप खासकर  त्यागी पुरूषों के लिए है | शरीर यात्रा के  लिए  आवश्यक आहारादि का समय  जपमय करना पड़ता है | कितना भी हो तो क्या ? सतत जप से  मन उचट ही जाता है  | इसलिए इसमें यह विधि  है कि जप से  जब चित्त उचटे तब थोडा समय ध्यान में लगावे  फिर तत्त्व चिंतन  करे और फिर जप करे |

अजपा जप

यह सहज जप है और सावधान रहने वाले से ही बनता है | किसी भी तरह से यह जप किया जा सकता है | अनुभवी महात्माओं  में यह जप देखने में आता है | इसके  लिए  माला का कुछ काम नहीं |श्वसोंच्छ्वास की  क्रिया बराबर हो ही रही है ,उसी के साथ मंत्रवृत्ति की जा सकती है | अभ्यास से  मंत्रार्थ दृढ हुई रहती ही है | सो उसका स्मरण होता है |

प्रदक्षिणा जप

इस जप में  हाथ में रुद्राक्ष या तुलसी की माला लेकर वरगद औदुम्बर या पीपल वृक्ष की अथवा ज्योतिर्लिन्ग आदि  के मन्दिर की या किसी  सिद्ध पुरुष की मन में ब्रह्मभावना करके मंत्र कहते हुए परिक्रमा करनी होती है | इससे भी सिद्धि  प्राप्त होती है | मनोरथ पूर्ण होती है | अष्टांगयोग जप में आ जाता है इसीलिए इसे जपयोग कहते है | कर्म, उपासना , ज्ञान और योग के मुख्य मुख्य  अंग जप योग में है इसीलिए यह मुख्य साधन है | यह योग सदा सर्वत्र सबके लिए है | इस समय तो इससे  बढ़कर कोई साधन  ही नहीं |