कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर लेना बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और यह एक अद्भुत और विचित्र अनुभव है जसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत है या सात चक्र जागृत है, वह साधारण मानव नहीं रह जाता है, वह एक योगिक और अलोकिक व्यक्ति हो जाता है, दुनिया के भौतिक सुखो से पर हो कर ईश्वर की साधन में लीन हो जाता है लेकिन ऐसे व्यक्ति के लिय कुछ भी प्राप्त करना असंभव नहीं रहता है।

कुण्डलिनी शक्ति – इस समस्त शरीर को-सम्पूर्ण जीवन कोशों को-महाशक्ति की प्राण प्रक्रिया संम्भाले हुए हैं । उस प्रक्रिया के दो ध्रुव-दो खण्ड हैं । एक को चय प्रक्रिया (एनाबॉलिक एक्शन) कहते हैं । इसी को दार्शनिक भाषा में शिव एवं शक्ति भी कहा जाता है । शिव क्षेत्र सहस्रार तथा शक्ति क्षेत्र मूलाधार कहा गया है । इन्हें परस्पर जोड़ने वाली, परिभ्रमणिका शक्ति का नाम कुण्डलिनी है | सहस्रार और मूलाधार का क्षेत्र विभाजन करते हुए मनीषियों ने मूलाधार से लेकर कण्ठ पर्यन्त का क्षेत्र एवं चक्र संस्थान ‘शक्ति‘ भाग बताया है और कण्ठ से ऊपर का स्थान ‘शिव’ देश कहा है । मूलाधार से कण्ठपर्यन्त शक्ति का स्थान है । कण्ठ से ऊपर से मस्तक तक शाम्भव स्थान है ।

मूलाधार से सहस्रार तक की, काम बीज से ब्रह्म बीज तक की यात्रा को ही महायात्रा कहते हैं । योगी इसी मार्ग को पूरा करते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचते हैं । जीव, सत्ता, प्राण, शक्ति का निवास जननेन्द्रिय मूल में है । प्राण उसी भूमि में रहने वाले रज वीर्य से उत्पन्न होते हैं । ब्रह्म सत्ता का निवास ब्रह्मलाक में-ब्रह्मरन्ध्र में माना गया है । यह द्युलोक देवलोक स्वर्गलोक है आत्मज्ञान का ब्रह्मज्ञान का सूर्य इसी लोक में निवास करता है । कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्म जी-कैलाशवासी शिव और शेषशायी विष्णु का निवास जिस मस्तिष्क मध्य केन्द्र में है-उसी नाभिक (न्यूविलस) को सहस्रार कहते है |

आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस मार्ग से होती है उसे मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं । उसका एक सिरा मस्तिष्क का-दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है । कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी क्षेत्र को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए हैं । इड़ा, पिंगला के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए नियोजित किये जाते हैं ।

साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं । झाड़ू झाड़न से कमरे की सफाई होती है । इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए है । इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है । इड़ा पिंगला के माध्यम से सुषम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम प्रस्तुत करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती है ।

मेरुदण्ड को राजमार्ग-महामार्ग कहते हैं । इसे धरती से स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया है । इस यात्रा के मध्य में सात लोक हैं । हिन्दू धर्म के भूःभुवःस्वःतपःमहःसत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध है । आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया है । इन विराम स्थलों को ‘चक्र ‘ कहा गया है । चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, एक अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है । अभिमन्यु उसमें फँस गया था । वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था । चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं । इस अलंकारिक प्रसंग को आत्मा का सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं । भौतिक आकर्षणों की, भ्राँतियों की विकृतियों की चहारदीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है । इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है ।

कुण्डलिनी चक्र – वैदिक साहित्य में मानव शरीरगत मूलाधार आदि चक्रो के नाम प्रतीकात्मक वैदिक नाम या संकेत मन्त्र ‘भू:’, ‘भुव:’, आदि सस महाव्यहतियो के रूप में है ! के आचार्य ‘भू:’, ‘भुव:’, आदि सस महायावतियो के रूप में है | योग के आचार्य ‘भू:’, नाम से मूलाधार, ‘भुव:’, से स्वाधिष्ठान ‘स्व:’, से मणिपुर चक्र, ‘मह:’, से हदय’ व ‘अनाहत चक्र’ ‘जन:’, से विशुद्धि चक्र’, ‘तप:’ से आज्ञा चक्र और ‘सत्यम’ से सहस्त्रार का ग्रहण करते है ! ये सब चक्र जहाँ अपनी निजी शक्ति तथा प्रकाश रखते है , वहा ये सब प्राणमय , मनोमय और विज्ञानमय कोशो की शक्ति तथा प्रकाशो से भी आवृत प्रभावित होते है ! अतः इन सभी चक्रों में आई मलिनता और इन पर छाया हुआ आवरण प्राणायाम साधना से दूर हो जाता है !

कुण्डलिनी चक्रो के नाम

मूलाधार चक्र – यह गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ियों वाला आधार चक्र है। आधार चक्र का ही दूसरा नाम मूलाधार है| इस चक्र को जाग्रत करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले प्राणायाम करके, अपना ध्यान मूलाधार चक्र पर केंद्रित करके मंत्र का उच्चारण करना चहिए। इसका मूल मंत्र ” लं” है। धीरे-धीरे जब यह चक्र जाग्रत होता है तो व्यक्ति में लालच ख़त्म हो जाता है और व्यक्ति को आत्मीय ज्ञान प्राप्त होने लगता है|

स्वाधिष्ठान चक्र – यह मूलाधार चक्र के ऊपर और नाभि के नीचे स्थित होता है। स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध जल तत्व से होता है। इस चक्र के जाग्रत हो जाने पर शारीरिक समस्या और विकार, क्रूरता, आलस्य, अविश्वास आदि दुर्गुणों का नाश होता है| शरीर में कोई भी विकार जल तत्व के ठीक न होने से होता है। इसका मूल मंत्र “वं ” है|

मणिपूर चक्र – यह तीसरा चक्र है जो नाभि से थोड़ा ऊपर होता है| योगिक क्रियाओं से कुंडलिनी जागरण करने वाले साधक जब अपनी ऊर्जा मणिपूर चक्र में जुटा लेते हैं, तो वो कर्मयोगी बन जाते हैं। यह चक्र प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय आदि मन में लड़ जमाये पड़े रहते है|

अनाहत चक्र – यह चक्र व्यक्ति के ह्रदय में स्थित रहता है। इस चक्र को जाग्रत करने के लिए व्यक्ति को हृदय पर ध्यान केंद्रित कर मूल मंत्र “यं” का उच्चारण करना चाहिए। अनाहत चक्र जाग्रत होते ही बहुत सारी सिद्धिया प्राप्त होती है| यह सोता रहे तो कपट, चिंता, मोह और अहंकार से मनुष्य भरा रहता है।

विशुद्ध चक्र – यह चक्र कंठ में विद्यमान रहता है। इसे जाग्रत करने के लिए व्यक्ति को कंठ पर ध्यान केंद्रित कर मूल मन्त्र “हं” का उच्चारण करना चहिये। विशुद्ध चक्र बहुत ही महवपूर्ण होता है। इसके जाग्रत होने से व्यक्ति अपनी वाणी को सिद्ध कर सकता है। इस चक्र के जाग्रत होने से संगीत विद्या सिद्ध होती है, शब्द का ज्ञान होता है और व्यक्ति विद्वान बनता है|

आज्ञा चक्र – आज्ञा चक्र भ्रू मध्य अर्थात दोनों आँखों के बीच में केंद्रित होता है। इस चक्र को जाग्रत करने के लिए व्यक्ति को मंत्र “ॐ” करना चाहिए| इसके जाग्रत होने ही मनुष्य को देव शक्ति और दिव्य दृष्टि की सिद्धि प्राप्त होती है। त्रिकाल ज्ञान, आत्म ज्ञान और देव दर्शन होता है|

सहस्रार चक्र – सहस्रार चक्र व्यक्ति के मष्तिष्क के मध्य भाग में स्थित होता है| बहुत काम लोग होते है जो इस चक्र को जाग्रत कर पाये इसे जाग्रत करना बहुत ही मुश्किल काम है। इसके लिए बरसो तपस्या और ध्यान करना होता है। इस चक्र को जाग्रत कर व्यक्ति परम आनंद को प्राप्त करता है और सुख -दुःख का उस पर कोई असर नहीं होता है|

जो शक्ति इस ब्रह्माण्ड में है, वही शक्ति, इस पिण्ड में भी है | शक्ति का मुख्य आधार मूलाधार चक्र है | मूलाधार चक्र के जाग्रत होने पर दिव्य शक्ति ऊर्ध्वगामिनी हो जाती है, यह कुण्डलिनी जागरण है | जैसे सब जगह विघुत के तार बिछाये हुए हो तथा बल्ब आदि भी लगाये हुए भी हो, उनका नियंत्रण मेन स्विच से जुड़ा होता है | जब मैन स्विच को ओन कर देते है, तो सभी यन्त्रों में विघुत का प्रवाह होने से सब जगह रोशनी होने लगती है, इसी प्रकार मूलाधार चक्र में सन्निहित दिव्य विघुतीय शक्ति के जाग्रत होने पर अन्य चक्रों का भी जागरण स्वत: होने लगता है |

यह कुण्डलिनी जागरण उर्ध्व उत्क्रमण करती हुई जब ऊपर उठती है, तब जहाँ जहा कुण्डलिनी शक्ति पहुचती है, वहा विद्यमान अधोमुख चक्रों का उर्ध्वमुख हो जाता है | जब यह शक्ति पहुचती है, तब सम्प्रज्ञात समाधी तथा जब सहस्त्राहार चक्र पर पहुचती है, तब समस्त वर्तियो के निरोध होने पर असम्प्रज्ञात समाधि होती है | इसी अवस्था मे आत्मा को चित में सन्निहित दिव्य ज्ञानलोक भी प्रकट हो लगता है, जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते है | इस ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति होने पर साधक को पूर्ण सत्य का बोध हो जाता है और अंत मे इस ऋतम्भरा प्रज्ञा के बाद साधक को निर्विघ्न समाधि का असीम, अनंत आनंद प्राप्त हो जाता है |

यही योग की चरम अवस्था है, इस अवस्था में पहुंचकर संस्कार रूप में विधमान वासनाओ का भी नास हो जाने से जन्म व मरण के बंधन के साधक मुक्त होकर के समस्त आनंद को प्राप्त कर लेता है |

Prashant Tripathi

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