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पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण एवं भौतिकवाद की अतिशय अनुपालना के कारण हम, हमारा समाज एवं हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति निरंतर पतन की और गतिशील है I विडम्बना यह है कि जिस पाश्चात्य संस्कृति और उसके भौतिकवाद का हम अन्धानुकरण कर रहे हैं वही पाश्चात्य संस्कृति हमारी सनातन संस्कृति को आत्मसात करने पर विवश है I प्राय: हमारा समाज, हमारी अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता के बारे में बाते करता तो मिल सकता है पर उसके पास न तो कोई सनातनी संस्कृति का ज्ञान होता है और न ही वह अपनी पीढ़ी को अपनी सनातनी संस्कृति के ज्ञान सम्प्रेषण में सक्षम प्रतीत होता है ऐसा कदापि नही है की आज के युग में कोई सनातनी अथवा वैदिक साहित्य उपलब्ध नही है पर इन सबके अध्ययन के लिए हम सबके पास समय ही नही है हम पूर्णत: भौतिक वाद की चमक – दमक की धारा में प्रवाहित हो रहे हैं इसका कारण यह भी माना जा सकता है कि वैयक्तिक सुख का उपभोग करने की लालसा के कारण हमारे संयुक्त परिवार टूट चुकने के कगार पर आ पहुंचे हैं इस कारण भी प्राचीन पारंपरिक ज्ञान पीढ़ी को प्राप्त नही हो पाता है I अस्तु

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हमारी सेवाएं


आमंत्रण

“सनातन संस्कृति सरिता “को और अधिक विस्तार देने व स्वयं की प्रतिभा को और अधिक निखारने के लिए लिए आप जैसे विद्वानों के लेख / कविता / कहानी आमंत्रित हैं,आप अपने सरल एवं सर्वग्राह्य भाषा के लेख हमें प्रकाशन के लिए भेज सकते हैं . 


व्यक्तिगत शंका समाधान

यदि आप सनातन संस्कृति का कोई भी तथ्य समझने में असमर्थ है या आपको किसी तथ्य पर कोई प्रमाणिक जानकारी चाहिए, तो आप सीधे हमारी टीम से सम्पर्क कर अपनी  शंका समाधान कर सकते हैं हमारी टीम आपको प्रमाणिकता से संतुष्ट करने का प्रयास करेगी .


बिछुआ पहनने का वैज्ञानिक कारण..


सप्त ऋषियों के नाम


सप्तर्षि (सप्त + ऋषि) सात ऋषियों को कहते हैं | जिनका उल्लेख वेद एवं अन्य हिन्दू ग्रन्थों में अनेकों बार हुआ है। वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- 1.वशिष्ठ, 2.विश्वामित्र, 3.कण्व, 4.भारद्वाज, 5.अत्रि, 6.वामदेव और 7.शौनक। 1.वशिष्ठ : […]

कुण्डलिनी शक्ति


कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर लेना बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और यह एक अद्भुत और विचित्र अनुभव है जसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत है या सात चक्र जागृत है, वह साधारण मानव नहीं रह जाता है, वह एक योगिक और अलोकिक व्यक्ति हो जाता है, दुनिया के भौतिक सुखो से पर हो कर ईश्वर की […]

अष्टांग योग


अष्टांग योग – महर्षि पतंजलि ने योग को ‘चित्त की वृत्तियों के निरोध’ (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने ‘योगसूत्र’ नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए अष्टांग योग (आठ अंगों वाले योग) का एक मार्ग विस्तार से बताया है। […]

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One thought on “Home

  1. सनातन संस्कृति के उत्थान और उन्नयन में समर्पित अति उत्तम पटल।

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